Siyasat Shayari

इस दौरे सियासत का इतना सा फ़साना है

बस्ती भी जलानी है मातम भी मनाना है।

सियासत की दुकानों में रोशनी के लिए,

जरूरी है कि मुल्क मेरा जलता रहे।

लड़ें, झगड़ें, भिड़ें, काटें, कटें, शमशीर हो जाएँ,

बटें, बाँटें, चुभे इक दुसरे को, तीर हो जाएँ,

मुसलसल कत्ल-ओ-गारत की नई तस्वीर हो जाएँ,

सियासत चाहती है हम और तुम कश्मीर हो जाएँ।

मुझे मत देखो यूँ उजाले में लाकर,

सियासत हूँ मैं कपड़े नहीं पहनती।

हर गरीब की थाली में खाना है,

लगता है यह चुनाव का आना है।

चाहते तो हम भी थे जीना शराफत से,

सियासत क्या मिली, शराफत चली गयी।

कुर्सी है, तुम्हारा ये जनाजा तो नहीं है,

कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते।

झूठे वादे, झूठी कसमें और ये फरेब,

तुम सियासत में होते तो कमाल करते।

सियासत अपना रुख अब इतना कड़ा मत कर,

इंसानियत को अब भगवा और हरा मत कर।

ऐ दिल चल उड़ चले कहीं दूर उस जहाँ में,

जहाँ मजहबी सियासते और सरहदें न हों।

काँटों से गुजर जाता हूँ दामन को बचा कर,

फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ।

समझने ही नहीं देती सियासत हम को सच्चाई,

कभी चेहरा नहीं मिलता कभी दर्पन नहीं मिलता।

सियासत को लहू पीने की लत है,

वरना मुल्क में सब ख़ैरियत है।

सियासत के मुखौटे से चासनी टपक रही है,

मालूम हुआ है चुनाव की मधुमखियाँ दौड़ रही हैं।

हिन्दुस्तान की फिजा में जहर घोल रहा हूँ,

साबधान दोस्तो... मैं सियासत खोर बोल रहा हूँ।

फलसफा समझो न असरारे सियासत समझो,

जिन्दगी सिर्फ हकीक़त है हकीक़त समझो,

जाने किस दिन हो हवायें भी नीलाम यहाँ,

आज तो साँस भी लेते हो ग़नीमत समझो।

तुम मेरे दोस्त हो... दुश्मन बन जाओ,

मगर ख़ुदा के लिए सियासत मत करो।

बुलंदी का नशा सिमतों का जादू तोड़ देती है,

हवा उड़ते हुए पंछी के बाज़ू तोड़ देती है,

सियासी भेड़ियों थोड़ी बहुत गैरत ज़रूरी है,

तवायफ तक किसी मौके पे घुंघरू तोड़ देती है।

ऐ सियासत तूने भी इस दौर में कमाल कर दिया,

गरीबों को गरीब अमीरों को माला-माल कर दिया।

फिर दोहराएंगे तमासा, मजहबी गोटियाँ फेकी जाएँगी,

मंदिर मस्जिद के मुद्दे पर सियासी रोटियां सेकी जाऐगी।

ये सियासत के चश्मे कुछ धुधले हो गए,

चुनावी वादे आजकल फिर जुमले हो गए।

इन से उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले,

ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले।

सियासत के खेल में कुर्सी की भूख होती है,

इसलिए तो हिन्दू मुसलमान में डाली फूट होती है।

सियासत इस कदर अवाम पे अहसान करती है,

आँखे छीन लेती है फिर चश्मे दान करती है।

फूलों का बिखरना तो मुक़द्दर ही था लेकिन,

कुछ इस में हवाओं की सियासत भी बहुत थी।