Dushmani Shayari

दुश्मनी का सफ़र एक कदम दो कदम,

तुम भी थक जाओगे, हम भी थक जाएंगे।

तूफानों ​की दुश्मनी से न बचते तो खैर थी​,

​साहिल से दोस्तों के भरम ने डुबो दिया​।

दुश्मनी जम के करो पर इतनी गुंजाईश रहे,

कल जो हम दोस्त बन जाये तो शर्मिंदा न हो।

वफ़ा पर दग़ा सुलह में दुश्मनी है,

भलाई का तो हरगिज़ ज़माना नहीं है।

जिस खत पे ये लगाई उसी का मिला जवाब,

इक मोहर मेरे पास है दुश्मन के नाम की।

आँखों से आँसुओं के दो कतरे क्या निकल पड़े,

मेरे सारे दुश्मन एकदम खुशी से उछल पडे़।

माँगा करेंगे अब से दुआ हिज्र-ए-यार की,

आखिर को दुश्मनी है दुआ की असर के साथ।

दुश्मनी लाख सही खत्म न कीजिये रिश्ता,

दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिये।

मेरी नाराज़गी पर हक़ मेरे अहबाब का है बस,

भला दुश्मन से भी कोई कभी नाराज़ होता है।

एक भी मौका न दो जो दोस्त हैं दुश्मन बनें,

दुश्मनों को लाख मौके दो तुम्हारे हो सकें।

ऐसे बिगड़े कि फिर जफ़ा भी न की,

दुश्मनी का भी हक अदा न हुआ।

बिना मकसद बहुत मुश्किल है जीना​,

खुदा आबाद रखना दुश्मनों को​ मेरे।​

इस कदर प्यार से मत बोला कर,

दुश्मनी का अहसास होता है।

जमाने की अदावत का सबब थी दोस्ती जिनकी,

अब उनको दुश्मनी है हमसे, दुनिया इसको कहते हैं।

इतनी शिद्दत से मुझे उस शख्स ने माँगा,

दुश्मनी के बावजूद इन्कार की सूरत ना थी।

दुश्मनों के साथ मेरे दोस्त भी आजाद हैं,

देखना है खींचता है मुझपे पहला तीर कौन।

वो दुश्मन बनकर, मुझे जीतने निकले थे,

दोस्ती कर लेते, तो मैं खुद ही हार जाता।

ये कह कर मेरे दुश्मन मुझे छोड़ गए,

कि तेरे अपने ही काफी हैं तुझे रुलाने के लिए।

जरूरत है मुझे नये नफरत करने वालों की,

पुराने दुश्मन तो अब मुझे चाहने लगे है।